*मानदेय वृद्धि, सामाजिक सुरक्षा, मातृत्व व विशेष अवकाश आदि की मांगों एकजुट हुई रसोइया*
अजय कुमार की रिपोर्ट
भागलपुर अंगएक्सप्रेस।
मजदूरों की कानूनी सुरक्षा को खत्म करने वाली लेबर कोड कानून को रद्द करने सहित 10 हजार रुपए मानदेय, सरकारी कर्मी का दर्जा, सामाजिक सुरक्षा, मातृत्व व विशेष अवकाश, एमडीएम से एनजीओ को हटाने आदि अन्य मांगों पर 24 फरवरी 2026 को पटना के गर्दनीबाग में मुख्यमंत्री के समक्ष विद्यालय रसोइया प्रदर्शन करेंगी। एक्टू से सम्बद्ध बिहार राज्य विद्यालय रसोइया संघ के आह्वान पर आयोजित इस प्रदर्शन में राज्य भर की विद्यालय रसोइया शामिल होंगी। प्रदर्शन की तैयारी को लेकर सोमवार को स्थानीय चांदपुर पंचायत के मोहद्दीपुर में जगदीशपुर, नाथनगर व शाहकुंड प्रखंड के सीमावर्ती गांवों की विद्यालय रसोइयों ने बैठक कर एकजुटता का प्रदर्शन किया। इसके पहले एक्टू एवं बिहार राज्य विद्यालय रसोइया संघ ने रसोइयों के बीच प्रचार प्रसार कर 24 फरवरी के राज्यव्यापी प्रदर्शन में शामिल होने पर जोर दिया।कार्यक्रम का नेतृत्व ऐक्टू राज्य सह जिला सचिव मुकेश मुक्त, संयुक्त सचिव राजेश कुमार दास, बिहार राज्य विद्यालय रसोइया संघ की संयोजक पूनम देवी, इंदु देवी, रानी देवी, चन्दना देवी, पूजा कुमारी, नीलम देवी, पुष्पलता कुमारी, कामनी देवी व गीता देवी ने किया।
कॉमरेड मुकेश मुक्त ने मौके पर कहा कि न्यूनतम मजदूरी से काफी कम मानदेय पाने वाली इन महिलाओं को मातृत्व और विशेष अवकाश तक नहीं मिलता है। सरकार रसोइयों को न तो कोई सामाजिक सुरक्षा देती है और न ही स्वास्थ्य बीमा व पेंशन। ड्रेस भी नहीं दिया जाता है। उल्टे सरकार लगातार एनजीओ को बढ़ावा देकर इनके काम को छीन रही है और एनजीओ के साथ मिलकर गरीब बच्चों के स्वास्थ्य और जीवन से खेल रही है। एनजीओ गुणवत्तापूर्ण भोजन बच्चों को नहीं देता है। एनजीओ के घटिया भोजन को खाकर बच्चों के बीमार होने की घटना आम हो गयी है। कई जगह से बच्चों द्वारा इनका परोसा खाना लेने से मना कर देने या खाना लेकर फेंक देने तक का मामला भी सामने आ रहा है। यह सब कमीशनखोरी के चक्कर में हो रहा है। ऊपर से नीचे तक केवल लूट और भ्रष्टाचार है। उन्होंने कहा कि सरकार की गलत नीतियों और कारगुज़ारियों की वजह से राज्य में लगातार विद्यालय रसोइयों की संख्या घटती जा रही है जो गम्भीर चिंता का विषय है। शिक्षा मंत्री ने विधानसभा में बताया है कि बिहार में दो लाख रसोइया हैं। जबकि 5 साल पहले ढाई लाख रसोइया थीं। महिला सशक्तिकरण के सरकारी दावों की बीच 50 हजार गरीब वंचित महिलाओं से उनका काम छीन लेना, झूठे सरकारी दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। विद्यालय रसोइयों की बहाली बंद है। सरकार एनजीओ को बढ़ावा दे रही है और रसोइयों को काम से हटा रही है। झूठे बहाने बनाकर समय से पहले रसोइयों को जबरन रिटायरमेंट भी दिया जा रहा है।बिहार राज्य विद्यालय रसोइया संघ की संयोजक पूनम देवी ने कहा कि चुनाव पूर्व रसोइयों का वोट लेने के लिए मानदेय में मामूली बढ़ोतरी हुई लेकिन अब उन्हें अन्य सुविधाएं तो दूर महीने महीने मानदेय तक नहीं दी जा रही है। बढ़ा हुआ मानदेय भी स्वयं सरकार द्वारा ही घोषित 541/- रुपए प्रतिदिन की न्यूनतम मजदूरी से काफी कम, मात्र 92/- रुपए प्रतिदिन है। रसोइयों को सरकार साल में 10 महीने ही मानदेय देती है। सरकार स्वयं न्यूनतम मजदूरी की सबसे बड़ी लुटेरी है। उन्होंने कहा कि रसोइयों पर केवल काम का बोझ बढ़ाया जा रहा है। यहां तक कि उनसे झाड़ू लगवाने और शौचालय में पानी तक डलवाने का मामला भी सामने आता रहता है। बिहार राज्य विद्यालय रसोइया संघ (एक्टू) रसोइयों की जायज मांगों पर लगातार आन्दोलनरत है। 24 फरवरी को एक बार फिर राज्य भर की रसोइया पटना में जुटेंगी। तैयारी जारी है, प्रदर्शन में शामिल होने के लिए विद्यालय रसोइयों कल 24 फरवरी को सुबह में भागलपुर से ट्रेन द्वारा पटना प्रस्थान करेंगे।
